इस कारण रुका सबसे आगे चल रही कोरोना वैक्सीन का ट्रायल

अंतिम चरण के ट्रायल (Vaccine Trail) में करीब 30 हजार लोग शामिल हैं। संभावना है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन बाजार में सबसे पहले आ सकती है।

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Vaccine Trail
इस कारण रुका सबसे आगे चल रही कोरोना वैक्सीन का ट्रायल

Delhi: कोरोना वायरस (Corona Virus) की वैक्सीन (Vaccine) बनाने की रेस में सबसे आगे एस्ट्राजेनेका (AstraZeneca) और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (Oxford University) की वैक्सीन का ट्रायल (Vaccine Trail) के अचानक रोकना पड़ा है। इसके तीसरे और अंतिम चरण के ट्रायल में करीब 30 हजार लोग शामिल हैं। संभावना जताई जा कही है कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन (Oxford University Vaccine) बाजार में सबसे पहले आ सकती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा दूसरी बार हुआ है जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कोरोना की वैक्सीन के ट्रायल को रोका गया है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मानव परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति अचानक बीमार पड़ गया, जिसकी वजह से ट्रायल को रोकना पड़ा। वही एस्ट्राजेनेका का कहना है कि यह एक सामान्य रुकावट है, क्योंकि परीक्षण में शामिल व्यक्ति की बीमारी के बारे में अभी तक कुछ भी पता नहीं चल पाया है।

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बता दें कि किसी भी वैक्सीन (Vaccine Trail) को बनाने की शुरुआत जानवरों से की जाती है। इसके लिए वैज्ञानिक सबसे ज्यादा परीक्षण बंदरों और चूहों पर ही करते हैं। पहले उन्हें वैक्सीन की खुराक दी जाती है और फिर देखा जाता है कि उससे प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पैदा होती है या नहीं। जानवरों पर सफल होने के बाद ‘फेज-1 सेफ्टी ट्रायल्स’ शुरू होता है और वैक्सीन का पहले चरण यानी मानव परीक्षण की शुरुआत होती है। पहले चरण के ट्रायल में 18 से 55 साल तक के कुछ स्वस्थ व्यक्तियों को चुना जाता है। जिन्हें वैक्सीन की खुराक देने के बाद शरीर पर प्रतिक्रिया की जांच की जाती है। इस पूरी प्रतिक्रिया में दिनों से लेकर महीनों तक लग सकते हैं। पहले चरण में नतीजे सकरात्मक निकलने के बाद ही दूसरे चरण की शुरुआत की जाती है।

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ट्रायल के दूसरे चरण में लगभग 100 लोगों को वैक्सीन की खुराक दी जाती है, जिसमें बच्चों से बुजुर्गों तक शामिल होते है। ऐसा बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं में वैक्सीन का समान असर देखने के लिए किया जाता है। इस ट्रायल प्रक्रिया में डॉक्टरों नियमित तौर पर साइड-इफेक्ट और इम्यूनिटी पर असर की जांच करते है। इसके बाद तीसरे यानी अंतिम चरण की शुरुआत होती है। और इसमें हजारों लोगों को शामिल किया जाता है। उन्हें वैक्सीन देने के बाद उनकी तुलना प्लेसेबो दिये गये स्वयंसेवकों से की जाती है। यही परीक्षण निर्धारित करते हैं कि वैक्सीन वायरस से बचाती है या नहीं। इसमें सफल होने के बाद वैक्सीन का उत्पादन और वितरण शुरू हो जाता है।

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