Dr. B.R. Ambedkar : आजादी की लड़ाई से दूर क्यों रहे डॉ भीमराव आंबेडकर? पढ़ें पूरी खबर

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Dr. B.R. Ambedkar : आजादी की लड़ाई से दूर क्यों रहे डॉ भीमराव आंबेडकर भारत में अधिकतर महान शख्सियतों के बारे में लोग दो खेमों में बंटे नजर आते है एक वर्ग उनकी अच्छाइयों को गिनाता है तो दूसरा उन पर अंगुली उठाता है डॉक्टर भीमराव आंबेडकर भी इससे अछूते नहीं रहे। एक तरफ उन्हें संविधान निर्माता और दलित समाज का उद्धारक बताया जाता तो दूसरी ओर कुछ लोग स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा न लेने की बात कहकर उनपर निशाना भी साधते हैं आंबेडकर के आलोचक दावा करते हैं कि वह अंग्रेजों के साथ थे और उन्हीं के मुताबिक काम करने की वकालत करते रहे।

बाल विवाह अंदोलन के लिए किया था विरोध

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर आंबेडकर का असल मकसद क्या था दरअसल आंबेडकर का मकसद वही था जो स्थापना के वक्त कांग्रेस का था 1880 से 1900 के दौर में कांग्रेस जैसे तमाम संगठन थे जो अपने समुदाय के लिए अधिकारों की मांग करते थे जैसे कि सती प्रथा और बाल विवाह का अंत करवाना फिर मराठा रेजिमेंट जाट रेजिमेंट और महार रेजिमेंट बनाने की मांग उठी सिविल सर्विसेज में कैंडिडेट्स की उम्र बढ़ाने के लिए भी विरोध प्रदर्शन होने लगे ताकि ब्रिटिश हुकूमत में हिंदुस्तानियों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले ये मांगें बढ़ते-बढ़ते 1929 में पूर्ण स्वराज और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुंचीं इस ऐतिहासिक क्रम पर नजर डालें तो पता चलता है कि आंबेडकर की मांग भी ऐसी ही थी वह पहले अपने समुदाय की भलाई चाहते थे उनका मानना था कि अगर किसी शख्स को समाज में सिर उठाकर चलने की आजादी नहीं तो उसके लिए देश की आजादी के कोई मायने नहीं।

डॉ आंबेडकर ने सभी जातियों का किया सम्मान

इसीलिए वह सत्ता में पिछड़े तबके की हिस्सेदारी चाहते थे जिन्हें जातीय व्यवस्था ने ऐसे कामों तक सीमित कर रखा था जो सम्मान की नजर से नहीं देखे जाते थे डॉ आंबेडकर दलितों की दुर्दशा के लिए हिंदू धर्म की ऊंच-नीच वाली व्यवस्था को जिम्मेदार मानते थे उन्होंने वर्ण व्यवस्था करने वाली किताब मनुस्मृति की प्रतियां भी जलाईं उनका कहना था कि हिंदू धर्म मनुस्मृति के हिसाब से चलता है, जिसमें ऊंच-नीच कूट-कूटकर भरा है द फिलॉसफी आफ हिंदुइज्म में आंबेडकर ने लिखा है‘मनु ने 4 वर्ण की वकालत की फिर चारों वर्णों को अलग-अलग रखने के लिए जाति व्यवस्था की नींव पड़ी मनु ने जाति की रचना की या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज जरूर बोए

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी सत्ता और जमीन-जायदाद में दलितों की हिस्सेदारी न के बराबर थी। डॉ आंबेडकर ने अपनी किताबों और लेखों में अनगिनत बार दलितों के उत्पीड़न उनके जातीय तिरस्कार वाली खबरों का हवाला दिया उनका मानना था कि हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था को खत्म किए बगैर यह मुमकिन ही नहीं कि दलित समाज में सम्मान के साथ जी सके यही वजह थी कि वह सत्ता में दलितों की हिस्सेदारी चाहते थे ताकि उनके खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोका जा सके

आंबेडकर दलितों की दशा सुधारने वाली मांगों पर ही अड़े रहे वहीं कांग्रेस लगातार अपनी मांगों और आंदोलन का दायरा बढ़ाती रही उसने दलितों से जुड़े मसलों को अनदेखा तो नहीं किया लेकिन उनकी स्थिति सुधारने के लिए कुछ किया भी नहीं। उसका मानना था कि जब आजादी मिल जाएगी तो दलितों के साथ होने वाले भेदभाव भी अपने आप खत्म हो जाएंगे वहीं आंबेडकर का कहना था कि छुआछूत अंग्रेजों की देन नहीं है जो उनके जाने के बाद खत्म हो जाएगी दलितों के साथ यह भेदभाव तो धार्मिक आधार पर सदियों से हो रहा हैआंबेडकर ने शोषितों और वंचितों को अधिकार दिलाने की अपनी मुहिम जारी रखी।

उन्हीं की वजह से साइमन कमिशन वंचित तबके को प्रतिनिधित्व देने को राजी हुआ वहीं कांग्रेस ने साइमन कमिशन के खिलाफ जोरदार आंदोलन चला रखा था ब्रिटिश सरकार ने अगस्त 1932 में दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया इसमें दलितों को दो वोट देने का अधिकार था एक वोट से वे अपने समुदाय का प्रतिनिधि चुन सकते थे दूसरे से किसी सामान्य वर्ग का स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई कर रहे महात्मा गांधी ने पृथक निर्वाचन का जोरदार विरोध किया उनका मानना था कि इससे दलितों और सवर्णों के बीच की खाईं और बढ़ जाएगी उन्होंने पृथक प्रतिनिधित्व के खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया गांधी की तबीयत बिगड़ने के साथ आंबेडकर के पुतले जलाए जाने लगे कई जगह दलित बस्तियों पर हमले भी हुए

आखिरकार आंबेडकर झुके और 24 सितंबर 1932 को गांधी और आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ इससे दलितों के पृथक निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया हालांकि दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या राज्यों के विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18 प्रतिशत कर दिया गया

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