क्या होता है टाइम कैप्सूल और इससे पहले कब हुआ इसका इस्तेमाल ?

टाइम कैप्सूल कुछ सदियों के बाद एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जाना जाएगा। टाइम कैप्सूल को एक ऐसे ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज के रूप में जाना जाता है

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Time Capsule

Delhi: अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर (Ram Mandir) के भूमि पूजन की तारीख के ऐलान के साथ तमाम तरह की खबरे सामने आ रही है। कहा जा रहा है कि राम मंदिर के 200 फीट नीचे एक कंटेनर के रूप में टाइम कैप्सूल (Time Capsule) डाला गया है। जिससे टाइम कैप्सूल (Time Capsule in India) कुछ सदियों के बाद एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जाना जाएगा। टाइम कैप्सूल को एक ऐसे ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज के रूप में जाना जाता है, जिसमें किसी काल की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति का उल्लेख हो। हालाकि इस खबर का खंडन किया जा चुका है।

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लेकिन आपको बता दे कि ये पहला मौका नहीं है जब किसी इमारत में टाइम कैप्सूल (Time Capsule) डालने की बात की जा रही है। भारत में पहले भी ऐसे टाइम कैप्सूल (Time Capsule in India) ऐतिहासिक महत्व की इमारतों की नींव में डाले जा चुके हैं। इंदिरा गांधी सरकार ने साल 1973 में लालकिले की नींव में कालपत्र नाम का ऐसा ही एक टाइम कैप्सूल डाला था। विपक्ष के लोगों ने आरोप लगाया था कि इस कालपत्र में इंदिरा ने अपने परिवार का महिमामंडन किया है। हालांकि इंदिरा सरकार के इस कालपत्र में क्या लिखा था, उसका राज आज तक नहीं खुला।

इसके पीछे सरकार की कोशिश थी कि आजादी के 25 साल बाद की स्थिति को संजोकर रखा जाए। और इसी के लिए टाइम कैप्सूल बनाने का आइडिया दिया गया। आजादी के बाद 25 सालों में देश की उपलब्धि और संघर्ष के बारे में उसमें उल्लेख किया जाना था। इंदिरा गांधी की सरकार ने उस टाइम कैप्सूल का नाम कालपात्र रखा था। अतीत की अहम घटनाओं को दर्ज करने का काम इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्ट्रिकल रिसर्च (आईसीएचआर) को सौंपा गया था। मद्रास क्रिस्चन कॉलेज के इतिहास के प्रफेसर एस.कृष्णासामी को पूरी पाण्डुलिपि तैयार करने का काम सौंपा गया था। लेकिन इसको पूरा होने से पहले ही प्रॉजेक्ट विवादों में फंस गया।

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कहा जाता है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त, 1973 को इसे लाल किले के परिसर में दफन किया था। इसके बाद इस कालपात्र पर विवाद की स्थितियां बनने लगीं। इस कालपात्र को लेकर उस समय काफी हंगामा मचा था। विपक्ष का कहना था कि इंदिरा गांधी ने टाइम कैप्सूल में अपना और अपने वंश का महिमामंडन किया है। जनता पार्टी ने चुनाव से पहले लोगों से वादा किया कि पार्टी कालपात्र को खोदकर निकालेगी और देखेगी कि इसमें क्या है।

1977 में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। सरकार गठन के कुछ दिनों बाद टाइम कैप्सूल को निकाला गया लेकिन जनता पार्टी की सरकार ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि उस टाइम कैप्सूल में क्या था। वही नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो साल 2011 में उन पर भी टाइम कैप्सूल दफनाने का विपक्ष ने आरोप लगाया था। विपक्ष का कहना था कि गांधीनगर में निर्मित महात्मा
मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल दफनाया गया है जिसमें मोदी ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया है।

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क्या होता है टाइम कैप्सूल
टाइम कैप्सूल एक कंटेनर की तरह होता है जिसे विशिष्ट सामग्री से बनाया जाता है। टाइम कैप्सूल हर तरह के मौसम का सामना करने में सक्षम होता है, उसे जमीन के अंदर काफी गहराई में दफनाया जाता है। काफी गहराई में होने के बावजूद भी हजारों साल तक न तो उसको कोई नुकसान पहुंचता है और न ही वह सड़ता-गलता है।30 नवंबर, 2017 में स्पोन के बर्गोस में करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल मिला था। यह यीशू मसीह के मूर्ति के रूप में था।
मूर्ति के अंदर एक दस्तावेज था जिसमें 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सूचना थी।

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