अमेरिकी राह पर चलकर GDP में सुधार ला सकता है भारत, जल्द उठाने होंगे जरूरी कदम

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से रुपए की कीमत डॉलर, पाउंड और यूरो के मुकाबले लगातार गिरती जा रही है, उससे यह साफ जाहिर है कि भारत की अर्थव्यवस्था मंदी की कगार पर है।

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आर्थिक मंदी से कितना लड़ने को तैयार है भारत, जानिए इस ब्लॉग में

विकास सक्सेना-

क्या देश में वाकई मंदी की आहट है? ये सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि देश में मंदी को लेकर अब चर्चाएं जोरों पर है। मंदी की सुगबुगाहट को केंद्र सरकार नकार रही है, लेकिन कहीं न कहीं डर उसे भी सता रहा है इसलिए तो अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के लिए कई तरह के बदलाव भी कर रही है।

वैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से रुपए की कीमत डॉलर, पाउंड और यूरो के मुकाबले लगातार गिरती जा रही है, उससे यह साफ जाहिर है कि भारत की अर्थव्यवस्था मंदी की कगार पर है। इसीलिए देश के दिग्गज इस समय मंदी की सुगबुगाहट पर इत्तेफाक भी रखते हैं क्यों कि जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में लगातार गिरावट आती है और सकल घरेलू उत्पाद कम से कम तीन महीने की डाउन ग्रोथ में होता है, तो इसे आर्थिक मंदी का बड़ा संकेत माना जाता है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों की मानें तो चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश की आर्थिक विकास दर घटकर (जीडीपी) महज पांच फीसदी रह गई है, जो पिछले साढ़े छह वर्षों के सबसे निचले स्तर पर है। पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.8 फीसदी रही थी।

इससे पहले इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (इंड-रा) ने 28 अगस्त को कहा था कि चालू वित्त वर्ष मंद वृद्धि वाला लगातार तीसरा साल होगा। हालांकि इसकी वजह एजेंसी ने मुख्य रूप से उपभोग की मांग में कमी, मॉनसून में देरी, विनिर्माण में गिरावट और निर्यात को प्रभावित करने वाले वैश्विक व्यापार में मंदी को बताया था।

हालांकि आगे बात करने से पहले हम यहां ऐसे संकेतों पर चर्चा कर लेते हैं, जिसकी वजह से यह पता लगेगा कि आर्थिक मंदी के बादल बहुत ज्यादा काले और घने क्यों हो गए हैं। मुख्य रूप से इसकी दो वजह हैं, पहली तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और दूसरी घरेलू स्तर पर।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर-

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई दर पर असर पड़ा है। डॉलर के मुकाबले रुपए की घटती कीमत मुख्य वजह है मंदी की। इस दौरान एक डॉलर की कीमत 72 रुपए तक पहुंच गई है। आयात के मुकाबले निर्यात में बहुत ज्यादा कमी आई है, जिसकी वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ा है और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है। अमेरिकी और चीन के बीच जारी ट्रेड वार का असर भी मंदी की मुख्य वजह है, जिसका असर भारत पर भी पड़ रहा है।

घरेलू स्तर पर-

अर्थव्यवस्था की विकास दर लगातार घटती जा रही रही है, जोकि आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा संकेत है। लोगों ने खपत यानी कंजम्प्शन कम कर दिया है, जिसकी वजह से खरीदारी की रफ्तार पर ब्रेक लगने लगा है और लोग खर्च पर काबू करने का प्रयास कर रहे हैं। इस वजह से सामान्य चीजों के साथ-साथ घरों और वाहनों की बिक्री घट गई है। ऐसा माना जाता है कि लोग गाड़ी खरीदना तभी पसंद करते हैं जब उनके पास अतिरिक्त पैसा होता है और यदि पैसा कम बच रहा है तो बिक्री कम होगी। लिहाजा कई जानकार वाहनों की बिक्री घटने को मंदी के शुरुआती संकेत मान रहे हैं।

ऐसे में लोग बैंक या निवेश के अन्य साधनों में पैसा तभी लगाते हैं, जब उनके पास पैसा बचेगा। लिहाजा इस वजह से बैंकों या वित्तीय संस्थानों के पास कर्ज देने के लिए पैसा घट जाएगा। जबकि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कर्ज की मांग और आपूर्ति, दोनों होना जरूरी है। अर्थव्यवस्था में उद्योग का पहिया धीमी रफ्तार से घूमने लगा है, जिसकी वजह से नए उत्पाद बनने की रफ्तार धीमी हो गई है और ऐसा इसलिए है क्योंकि बाजार में बिक्री घट गई है।

रोजगार के अवसरों में भी कमी आई है। उत्पादन न होने की वजह से उद्योगों ने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है। ऑटो सेक्टर में 3.5 लाख लोगों की नौकरियां चलीं गईं हैं और 10 लाख नौकरियां खतरे में हैं। आम लोगों के जहन में मंदी का डर इस कदर घर चुका है कि उन्हें अपनी नौकरी जाने का खतरा सताने लगा है। लिहाजा अब वे बचत की ओर ज्यादा ध्यान देने और निवेश से परहेज करने लगे हैं, जिसकी वजह से लिक्विडिटी कम हो गई है। और अर्थव्यवस्था में जब लिक्विडिटी घटती है, तो इसे भी आर्थिक मंदी का संकेत माना जा सकता है।

तो ये हैं बड़ी वजह देश में मंदी की आहट की, जिसे लेकर तमाम अर्थशास्त्री अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। इससे निपटने के लिए आरबीआई ने लगातार चार बार रेपो रेट में कटौती की, लेकिन इसका असर तत्काल प्रभाव से दिखाई देगा, यह कहना सही नहीं है। लगातार चार बार में रिजर्व बैंक कुल एक फीसदी की कटौती कर चुका है ताकि अर्थव्यवस्था में उद्योग का पहिया फिर से रफ्तार पकड़ सके। इस समय यह रेपो रेट 5.4% है।

आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति पॉलिसी की मदद से रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता है। और यही वजह है कि वह चार बार अपनी रेपो रेट में कमी कर चुका है ताकि उपभोक्ता कर्ज लेकर जरूरी सामान खरीद सकें और बाजार में मांग बढ़ सके। बड़े निवेशकों के लिए कर्ज लेकर फैक्ट्रियां, कारखाने लगाना आसान हो सके। हालांकि इससे होगा ये कि उपभोक्ता की मांग और निवेशक की आपूर्ति में सही चक्र स्थापित होगा और देश की अर्थव्यवस्था का पहिया थोड़ी रफ्तार पकड़ेगा। लेकिन अभी कई कोशिशों के बाद भी उद्योंगों की वृद्धि रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है।

इंफोसिस के पूर्व सीईओ मोहनदास पई का तो यहां तक मानना है कि इंडस्ट्री अब और ज्यादा झटके बर्दाश्त नहीं कर सकती है, क्योंकि मोदी सरकार में इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक झटके दिये जा रहे हैं। पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स), आइबीसी (इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) और इसके बाद रेरा (रियल एस्टेट रेग्युलेशन एक्ट)। इन फैसलों की वजह से उद्योगों के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का भी यही मानना है कि एक के बाद एक लिए गए दो बड़े फैसले नोटबंदी और जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका दिया है। इनका मानना है कि अगर इन फैसलों के बीच कुछ और समय दिया जाता, तो शायद स्थित ये न बनती। लेकिन इन सबके बीच वैश्विक वित्तीय सेवा कंपनी मोर्गन स्टेनली ने तो यहां तक कह दिया कि यदि अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार ऐसे ही चलता रहा और टैरिफ बढ़ते रहे, तो 2020 तक दुनिया मंदी की चपेट में आ जाएगी।

वैसे भारत सरकार को इस समय डोनाल्ड ट्रंप की नीति अपनानी चाहिए, जिन्होंने न केवल कॉरपोरेट टैक्सेज कम किए हैं, बल्कि अन्य तरह के टैक्सेज कम करने की घोषणा कर लोगों में विश्वास बनाया है। यहां बेरोजगारी भी बेहद कम है। ह्युंडई मोटर इंडिया के सीईओ एस.एस. किम ने भी इसी तरह का सुझाव दिया है कि भारत सरकार को इस समय जीएसटी दरें कम कर देनी चाहिए, क्योंकि एक तो कंजप्शन बढ़ेगा ही और मैन्युफैक्चरिंग में भी तेजी आएगी। हालांकि एक तरह से देखा जाए तो किम का कहना कई मायनों में सही है, क्योंकि भारत में टैक्सेज कम कर देने से वे अमेरिकी कंपनियां भारत की ओर रुख करना शुरू कर सकती हैं, जो अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर में फंसकर भारत की बजाय वियतनाम, थाइलैंड और सिंगापुर की तरफ रुख कर रही हैं, क्योंकि वहां उन्हें कम टैक्सेज में काम करने का मौका मिलता है, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्र संगठन (ASIAN) के सदस्य हैं और इनके बीच फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट भी है।

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