India Bans Wheat Export: भारत को ‘भिखारियों का मुल्क’ कहने वाला अमेरिका आज गेहूं के लिए गुहार लगा रहा है

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India Bans Wheat Export: पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के बाद अब आटे की कीमतों को महंगाई की नजर लग गई है। आटे की बढ़ती कीमतों को काबू में करने के लिए भारत सरकार ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी है। हलांकि भारत सरकार के इस कदम की काफी आलोचना की जा रही है। अमेरिका समेत दुनिया कई देशों ने भी भारत सरकार के इस फैसले पर चिंता जताई है।

भारत दुनिया के ऐसे देशों में शामिल है जो सबसे ज्यादा गेहूं का निर्यात करता है, जबकि पहले नंबर पर चीन है। भारत ने गेहूं के निर्यात पर ऐसे वक्त में रोक लगाई है जब रूस-यूक्रेन जंग की वजह से दुनियाभर में गेहूं की सप्लाई पर असर पड़ा है।

भारत के फैसले से चिढ़ा अमेरिका

भारत की ओऱ से गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने वाले फैसले से अमेरिका चिढ़ गया है। अमेरिका के कृषि सचिव टॉम विल्सैक ने भारत के इस फैसले को ‘गलत समय में गलत कदम’ बताया है। विल्सैक ने कहा कि हमें एक ऐसे बाजार की जरूरत है, जो जरूरतमंद लोगों तक सामान पहुंचाने में मदद करे।

एक वक्त आज है जब गेहूं का निर्यात रोकने वाले भारत के फैसले पर अमेरिका नाराजगी (India Bans Wheat Export) जता रहा है, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब अमेरिका भारत को गेहूं के लिए धमकाता था। शायद समय का पहिया घूमना इसी को कहते हैं। एक जमाना वो भी था जब भारत गेहूं के लिए अमेरिका पर निर्भर हुआ करता था। ये वक्त है साल 1965 का जब एक ओर भारत और पाकिस्तान की लड़ाई चल रही थी और दूसरी ओर अमेरिका भारत को गेहूं के लिए धमका रहा था। इतना ही नहीं, अमेरिका ने एक बार भारत को ‘भिखारियों’ का देश भी बताया था।

भारत की खाद्यान्न जरूरतों के लिए अमेरिका से समझौता

सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को आखिर किसकी नजर लगी कि उसे अमेरिका गेंहू के लिए धमकाने लगा! ये समय था 27 मई 1964 का, जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया था और लाल बहादुर शास्त्री को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। साल 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग के दौरान लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया।

रामचंद्र गुहा की किताब ‘नेहरू के बाद भारत’ में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि कैसे भारत में मॉनसून ने दगा दिया, अनाज के उत्पादन में गिरावट आई और बात यहां तक आ पहुंची कि भारत को साल 1964 और साल 1965 में सूखे का भी सामना करना पड़ा। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भारत की उस स्थिति से बेहद चिंतित थे।

देश की कमान संभालने के बाद शास्त्री जी ने सबसे पहले भारत का कृषि बजट बढ़ाया। सी. सुब्रह्मण्यम को खाद्य और कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा, उन्नत किस्म के बीजों के उत्पादन के लिए भारतीय बीज निगम की स्थापना भी की गई।

फिर भी जब तक भारत खाद्यान्न उत्पादन में सक्षम नहीं होता, तब तक उसकी खाद्य सुरक्षा की गारंटी जरूरी थी। इसके लिए सुब्रह्मण्यम ने अमेरिका का दौरा किया औऱ अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन से मुलाकात की। इसी मुलाकात के दौरान भारत और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ। समझौते के तहत अमेरिका भारत को लंबी अवधि और कम ब्जाय दर पर कई कर्ज दिए और गेहूं की आपूर्ति करने पर राजी हो गया। अमेरिका से गेहूं मिलने से भारत को खाद्यान्न समस्या से तात्कालिन राहत मिली।

अमेरिका ने भारत को गेहूं के लिए धमकाया

साल 1962 में चीन औऱ भारत के बीच जंग हुई। इस जंग के कारण पाकिस्तान ने भारत को हल्के में लेकर कमजोर समझना शुरू कर दिया। जिसके बाद 5 अगस्त साल 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक LOC पार कर कश्मीर में घुस आए। भारत की सेना ने पाकिस्तान की इस हरकत का करारा जवाब देते हुए लाहौर तक घुस गई। हालांकि, भारत ने साफ कर दिया कि उसका मकसद लाहौर पर कब्जा करना नहीं है।

पाकिस्तान के साथ भारत के इस युद्ध के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने भारत को धमकाते हुए कहा कि अगर युद्ध नहीं रोका, तो गेहूं की आपूर्ति रोक दी जाएगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्री को ये बात बहुत चुभी और उन्होंने अमेरिका की इस धमकी को नकार दिया।

अमेरिका की इस धमकी के बाद शास्त्री जी ने रामलीला मैदान में एक रैली की, ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया औऱ देशवासियों से अपील की कि वो हफ्ते में एक वक्त का खाना खाना छोड़ दें। उन्होंने खुद भी एक वक्त का खाना खाना छोड़ दिया। शास्त्री की अपील का असर ये हुआ कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने हफ्ते में एक वक्त का खाना छोड़ दिया।

अमेरिका ने भारत को ‘भिखारियों’ का मुल्क बताया 

साल 1966 में इंदिरा गांधी बतौर भारत की प्रधानमंत्री अपनी पहली विदेश यात्रा पर गई थीं। इस दौरान भी भारत अपने खाद्यान्न जरूरतों के लिए भारत पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर था। लिहाजा इंदिरा गांधी के इस दौरा का मुख्य मकसद भी अमेरिका था। ‘नेहरू के बाद भारत’ किताब के मुताबिक, इंदिरा गांधी की यात्रा पर अल्बामा के एक अखबार ने हेडलाइन छापी, “भारत की नई प्रधानमंत्री खाद्यान्नों की भीख मांगने अमेरिका आ रहीं हैं।”

इंदिरा गांधी के दौरे के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन उनके हाव-भाव और व्यवहार से काफी प्रभावित हुए लेकिन जैसी ही इंदिरा भारत वापस लौटीं तो अमेरिका ने भारत की मांग को पूरा करने में शर्तें रख दीं। भारत ने सालभर के लिए एक ही बार में खाद्यान्न सहायता की मांग की थी, लेकिन जॉनसन ने उसे महीने दर महीने के हिसाब से जारी करने का फैसला कर लिया। जॉनसन के मुताबिक भारतीयों को अभी दुनिया के तौर-तरीके मालूम नहीं थे, उनमें बहुत अकड़ थी और उनकी अकड़ को तोड़ना जरूरी था। जॉनसन ने यहां तक कह दिया कि उन्हें खेती का काम सिखाने के लिए अमेरिका से हजार मजदूरों को भारत भेजा जाना चाहिए। हालांकि भारत ने इसे ‘क्रूर फैसला’ बताया था ।

1965 और 1966 में भारत ने अमेरिका से पब्लिक लोन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ टन गेहूं का आयात किया। इसे PL480 के नाम से जाना जाता है। इस अनाज से करीब 4 करोड़ हिंदुस्तानियों की भूख मिटाई जा सकी। अमेरिका के कृषि विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत का मजाक उड़ाते हुए लिखा, ‘हिंदुस्तान भिखारियों और निराश्रितों का मुल्क है।’

1966 में मॉनसून ने फिर दगा दे दिया और भारत को फिर से अकाल का सामना करना पड़ा. एक बार फिर PL480 के तहत अमेरिका पर खाद्यान्न के लिए निर्भर होना पड़ा।

गेहूं के लिए अब अमेरिका भारत से गुहार लगा रहा है

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की किल्लत थी जिसकी भरपाई भारत कर रहा था। लेकिन जब से भारत ने निर्यात (India Bans Wheat Export) पर रोक लगाई है तब से अमेरिका अपनी नाराजगी जाहिर करता आ रहा है। भारत ने 13 मई को गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी। भारत के इस फैसले से अमेरिका नाखुश है। भारत के फैसले पर संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफिल्ड ने कहा कि “इससे भोजन की कमी और बढ़ जाएगी। अमेरिका को उम्मीद है कि भारत गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा।”

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