Atal Bihari Vajpayee Jayanti: अटल जी की जयंती आज, जानें उनका राजनीतिक सफर…क्या कटरपंथी से जुड़े थे वाजपेयी ?

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Atal Bihari Vajpayee Jayanti: अटल जी की जयंती आज, जानें उनका राजनीतिक सफर...क्या कटरपंथी से जुड़े थे वाजपेयी ?

Atal Bihari Vajpayee Jayanti: आज पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) जी की 97 जयंती मनाई जा रही है। अटल विहारी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। इनके पिता कृष्णविहारी एक शिक्षक थे। वह शिक्षक के साथ हिंदी साहित्य व ब्रजभाषा के कवि भी थे। इसलिए कह सकते हैं की अटल जी को काव्य लिखने की कला विरासत में मिली।

अटल जी ने कैसे की राजनीती की शुरुवात ?

बता दें की उन्होंने अपना कैरियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की थी। उन्होंने राष्ट्रधर्म पांच्यजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया था । बाजपेयी जी ने राजनीति की शुरुआत 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेकर की थी अटल bih। अटल की राजनीतिक विज्ञान व विधि के छात्र भी थे। वह शुरू से ही विदेशी मामलों के प्रति बहुत रूचि रखते थे। 1951 में वह भारतीय जनसंघ में शामिल हुए और पत्रकारिता छोड़ दी। जनसंघ वह पार्टी है जिसे आज भारतीय जनता पार्टी के नाम से जाना जाता है। अटल बिहारी वाजपोई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के को-लीडर भी रह चुके है।

कैसा रहा अटल जी का राजनीतिक सफर ?

अटल जी ने भारतीय जनसंघ पार्टी से जुड़ने के बाद अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। अटल जी 9 बार लोकसभा सदस्य व 2 बार राजयसभा सदस्य चुने गए जो अपने आप में एक गौरान्वित करती है। अपनी ईमानदारी और निष्ठा के प्रति ईमानदारी और लगन से काम करने के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया और 1994 में उन्हें भारत का सर्वश्रेष्ठ सांसद भी चुना गया।

वह बातें जो अटल को बनातीं हैं सबसे लोकप्रिय नेता

अटल बिहारी बाजपेयी जी ने परमाणु शक्ति से संपन्न राज्यों से बिना डरे अपने नेतृत्व में 1998 में राजस्थान के पोखरण में द्वितीय परमाणु का परिक्षण कराया जिसकी अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों को भनक तक नहीं लगी। अपनी पार्टी हो या दूसरी पार्टी वो सभी को साथ लेकर चलते थे यही खूबी उन्हें दूसरे अलग नेताओं से अलग करती थी।

उदारवादी विचारधारा के साथ कट्टरपंथी भी थे बाजपेयी

अटल बिहारी बाजपेयी एक उदारवादी नेता तो थे साथ में वह एक कट्टरपंथी विचारधारा भी रखते थे। ये कहा जाता है की बाजपेयी ने 1983 में असम के नेल्ली दंगों के ठीक पहले खूब भड़काऊ भाषण दिए थे। 5 दिसंबर 1992 को वाजपेयी लखनऊ के अमीनाबाद में आरएसएस (RSS) की उत्साही भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा था ‘अयोध्या में पूजा पाठ के लिए जमीन को समतल किया जाना बहुत ज़रूरी है उसके अगले ही दिन 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ढा दिया गया था। उस दिन भाषण देने के बाद वह लखनऊ से रवाना हो गए थे और अयोध्या नही पहुंचे उनके लखनऊ से लौट आने को एक शातिर चाल माना जाता है ताकि बीच के लोगों में उनकी छवि बानी रहे’।

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