लाल ग्रह पर संभावनाओं की तलाश, बस्तियां बसाने के लिए बनाई गई ‘अंतरिक्ष ईंट’

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‘मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है’, एक वक्त था जब ये स्लोगन सिर्फ सुनने के लिए मिलता था, लेकिन अब ये सपने साकार होते हुए भी दिखाई दे रहे हैं। आधुनिक होती इस दुनिया में अब लोग स्पेस तक जाने के लिए नई-नई खोज और प्रयास कर रहे हैं। देश की स्पेट एजेंसी के सशक्तिकरण के लिए सरकार हमेशा से ही प्रयासरत रही है। इसी क्रम में मंगल ग्रह पर इमारत बनाने के लिए ‘अंतरिक्ष ईंट’ का निर्माण किया गया है।

‘अंतरिक्ष ईंट’ ये शब्द सुनने में ही अनोखा है और जिज्ञासा बढ़ाने वाला है। ये नाम सुनते ही ज़हन में सवाल उठता है कि ये आम ईंटों जैसा ही होगा या इसमे तकनीक का कोई अनोखा कमाल होगा। जहां एक तरफ लाल ग्रह पर संभावनाओं की तलाश में दुनियाभर के वैज्ञानिक जुटे हैं, वहीं वैज्ञानिकों ने मंगल पर बस्तियां बसाने के लिए ‘अंतरिक्ष ईंट’ बनाने के लिए बैक्टीरिया आधारित एक विशेष तकनीक विकसित की है।

बेंगलूरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों ने ‘अंतरिक्ष ईंट’ बनाने के लिए मंगल की सिमुलेंट सॉयल (MSS) यानी प्रतिकृति मिट्टी और यूरिया का उपयोग किया है। इन  ‘अंतरिक्ष ईंटों’ का इस्तेमाल मंगल ग्रह पर इमारतों के निर्माण में किा जाएगा।

पत्रिका ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित की गई विधि

अंतरिक्ष ईंट के निर्माण की विधि को शोध पत्रिका ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित किया गया है। इस ईंट के निर्माण के लिए सबसे पहले मंगल की मिट्टी को ग्वार गम, स्पोरोसारसीना पेस्टुरी (Sporosarcina pasteurii) नामक बैक्टीरिया, यूरिया, और निकल क्लोराइड (NiCl2) के साथ मिलाकर एक घोल बनाया जाता है। इस घोल को कोई भी आकार दे सकते हैं। कुछ दिनों में बैक्टीरिया, यूरिया को कैल्शियम कार्बोनेट के क्रिस्टल में बदल देते हैं और ये क्रिस्टल, बैक्टीरिया द्वारा स्रावित बायोपॉलिमर के साथ मिलकर मिट्टी के कणों को एक साथ बांधे रखते हैं।

इस ईंट के निर्माण के लिए पानी और मिट्टी की सही मात्रा रखनी जरूरी है क्योंकि दूसरे तरीकों से इस ईंट को बना पाना मुश्किल है।

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