राष्ट्रीय प्रेस दिवस: ‘सच’ की खामोशी बयां करती है देश में मौजूदा दौर की प्रेस की दुर्दशा…

राष्ट्रीय प्रेस दिवस (National Press Day):  मैं, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के बारे में क्या लिखूं जनाब, जब कलम ही कैद है...बंदिशें उस पर भारी हैं इस बात का अफसोस है... पत्रकारिता पर सत्ता का पहरा है ?

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस'

लेखक: महेश कुमार यदुवंशी

राष्ट्रीय प्रेस दिवस (National Press Day):  मैं, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के बारे में क्या लिखूं जनाब, जब कलम ही कैद है…बंदिशें उस पर भारी हैं… इस बात का अफसोस है… पत्रकारिता पर सत्ता का पहरा है ?

दरअसल, आज हम ‘राष्ट्रीय प्रेस दिवस’ मना रहे हैं, इसलिए प्रेस के बारे में जानना जरूरी है और जब हम प्रेस के बारे कोई बात करते हैं तो सबसे पहले उसके महत्व और उसकी ‘आजादी’ की बात करना जरूरी हो जाता है।

मौजूदा वक्त में प्रेस की आजादी (Freedom of press)-

भारतीय प्रेस का अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। जहां एक ओर आजादी की लड़ाई में प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वहीं देश में सदियों से चली आ रही कुरीतियों को मिटाने में भी पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन, मौजूदा वक्त में की प्रेस आजादी को लेकर बड़ा संकट खड़ा है।

आज हमारे देश में आए दिन लेखक, कवि और पत्रकारों की हत्याएं की जा रही हैं। ऐसे कई मामलों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की शह भी होती है!

उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट यानी आई.एफ.जे. के सर्व के मुताबिक, वर्ष 2016 में पूरे विश्व में 122 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गए। जिसमें भारत में भी 6 पत्रकारों की हत्या हुई हैं। आज शायद ही को सच्चा पत्रकार होगा जिसे जान से मारने की धमकी न मिलती हो।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 3 पायदान नीचे गिरा भारत-

मौजूदा वक्त में भारत सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने वालों पर हमलों की संख्या में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। इसका शिकार ईमानदार पत्रकार और समाजसेवी हुए हैं। मॉब लिंचिंग (भीड़ हिंसा) की घटनाओं में उन्मादी भीड़ द्वारा किए गए कई हमलों में सरकार की शह की बू आई है! कई मामले ऐसे भी आए हैं जिनमें सत्ता के संरक्षण में पलने वाले लोगों पर हत्या, लूट , रेप जैसी जघन्य और निंदनीय घटनाओं को अंजाम देने का आरोप लगा है।

यही कारण है कि ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में भारत तीन पायदान पीछे होते हुए 136 नंबर पर आ गया है। इसका मतलब है कि भारत में प्रेस की आजादी शून्यता पर है। सरकार के कारनामों को उजागर करने वाले पत्रकारों की गिरफ्तारी इस वक्त आम बात हो गई है।

मसलन, हाल ही में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में एक स्वतंत्र पत्रकार ने स्कूली बच्चों को मिल रहे ‘मिड डे मील’ में नमक रोटी दिए जाने की एक खबर को दिखाया था, जिसके बाद उसे जेल जाना पड़ा था। ऐसी घटनाओं को अगर प्रेस की आजादी की हत्या न कहा जाए, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

प्रेस की आजादी पर हमले के ऐसे ही कई जीवंत उदाहरण है, जिनमें से प्रमुख हैं- बेंगलुरु में कन्नड़ भाषा की साप्ताहिक संपादक व दक्षिणपंथी आलोचक गौरी लंकेश की गोली मारकर निर्मम हत्या, इससे पहले नरेंद्र दाभोलकर, डॉ. एम.एम. कलबुर्गी और डॉ. पंसारे की हत्या शामिल हैं।

दरअसल, भारत में प्रेस की आजादी को लेकर मौजूदा वक्त में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मसलन, क्या सरकार प्रेस की आजादी पर पहरा लगाने की कोशिश कर रही है ? क्या बेखौफ होकर सच की आवाज उठाना लोकतंत्र में मौत को दावत देने जैसा है ?

प्रेस की आजादी पर सरकार का प्रहार-

वैसे तो प्रेस ‘हुकूमत’ की खामियां मजबूती से उजागर करने के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन कई बार ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जिनमें शक्तिशाली हुकूमतों ने मीडिया का दमन किया है। इसका सटीक उदाहरण कांग्रेस की इंदिरा गांधी की सरकार का है।

आजाद भारत के इतिहास पर नजर डालें तो एक बात साफ है कि जब भी केंद्र में बहुमत की सरकार आती है, तब प्रेस की आजादी पर अंकुश लगने शुरू हो जाते हैं। मालूम हो कि वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर प्रेस की हत्या की थी।

आपातकाल (Emergency) के दौरान न्यूज़ पेपर की हेडलाइन संजय गांधी के कार्यालय से तय होती थी। ये भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय था।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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