अजीत न रहे अजीत, देवेंन्द्र भी पराजित

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अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार

अजीत न रहे अजीत, देवेंन्द्र भी पराजित

शिवसेना को कोसते हुए देवेंद्र फड़नवीस ने महाराष्ट्र के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले अजीत ने डिप्टी सीएम पद छोड़ा और अपने पुराने रिश्ते और पुराने घर को तरजीह देते हुए चाचा शरद पवार की बात मान ली। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद बदले सियासी हालात ने बुधवार पांच बजे के फ्लोर टेस्ट से पहले ही नतीज़े सामने कर दिए। इस पूरे सियासी कवायद में जो शख्स विजेता बनकर खड़ा दिखाई दे रहा है वो शरद पवार हैं।

1999 में ‘राज करेगा हिंदुस्तानी’ का नारा देकर सोनिया गांधी को पीएम की कुर्सी से रोकने की कामयाब कोशिश करने वाले शरद पवार के सामने देवेंद्र भला क्या चीज़ थे। सोनिया और उद्धव की ताकत के साथ खड़े मराठा क्षत्रप शरद पवार की रणनीति को पराजित करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था, वो भी केंद्र में मोदी के रहते हुए। जैसा कि देवेंद्र ने कहा था मोदी है तो मुमकिन है, वैसा बिल्कुल नहीं हुआ।

देवेंद्र प्रगतिशील नेता हैं ।उनका पिछला कार्यकाल भी बेहतर माना जा सकता है, लेकिन ताजा प्रसंग में दिखी उनकी जल्दबाज़ी ने उन्हें माइनस मार्किंग में पहुंचा दिया। अजीत के लिए चक्की पीसिंग का चुनावी जुमला देकर उन्हीं के साथ सरकार बनाने वाले देवेंद्र के हिस्से में न तो सरकार रही और न  ही सरोकार। इसके साथ थी नाटकीय तरीक़े से उन्हें कुर्सी पर बिठाने की कोश्यारी की होशियारी भी सवालों में रही और दिल्ली में बैठे उन चाणक्यों की रणनीति भी जो नेपथ्य से इस महानाटक में अपना योगदान दे रहे थे।

सबको थोड़ी देर के लिए ज़रूर ये लगा था कि चाचा पर भतीजे ने बाजी मार ली है, लेकिन चाचा तो आखिर चाचा निकले उन्होंने बाज़ी पूरी तरह पलट डाली वो भी ऐसी कि न तो तरफदार रहा और न ही मददगार रहा।

 इस पूरे प्रसंग का लब्बोलुआब ये है कि पवार का पवार महाराष्ट्र की नई सुबह का आधार बन गया और उनका परिश्रम पराक्रम में बनकर परचम के रूप में लहराने लगा

सियासी पैंतरों के उस्ताद शरद पवार सियासी विजेता के तौर पर तो जाने जी जाएंगे जाने अनजाने में अपने पैंतरों से अपने मित्र और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी के चाणक्यनुमा अध्यक्ष अमित शाह को मात देने के लिए भी जाने जाएंगे।

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