हम अपनी अपेक्षाओं से आहत हैं ! उम्मीदें हमें कहां लेकर जाती हैं….

मनुष्य को अवश्य प्रगतिशील होना चाहिए, यह मनुष्य होने की सर्वप्रथम अवधारणा भी है और मनुष्यता का धर्म भी। अगर पुरा-पाषाणिक युग में मनुष्य आग, पहिए और पत्थर के औज़ारों से खुश हो गया होता तो शायद हम यहां तक पहुंच नहीं पाते।

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सलिल सरोज

कार्यकारी अधिकारी, लोक सभा सचिवालय ।।

मनुष्य को अवश्य प्रगतिशील होना चाहिए, यह मनुष्य होने की सर्वप्रथम अवधारणा भी है और मनुष्यता का धर्म भी। अगर पुरा-पाषाणिक युग में मनुष्य आग, पहिए और पत्थर के औज़ारों से खुश हो गया होता तो शायद हम यहां तक पहुंच नहीं पाते।

आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, लेकिन यह कथन तब प्रतिपादित हुआ था जब हमारी आवश्यकताएं बहुत ही मूलभूत थी और बहुत ही स्वजनित हुआ करती थी। लेकिन उपभोगतावाद की आंधी में मनुष्य अपनी छोटी-छोटी जरूरतों को पीछे छोड़ कर किसी होड़ में लग गया हो,ऐसा प्रतीत होता है।

यह बहुत नैसर्गिक है कि प्रगति के लिए नई आवश्यकताएं उत्पन्न हों और उनको पूरा करने हेतु मनुष्य जिज्ञासु हो। लेकिन एक यक्षप्रश्न, जो सुरसा की तरह आज पूरे मानव जाति को निगलने हेतु मुंह बाए खड़ी है, वह है क्या हमारी आज की सारी जरूरतें सच की हैं या ये जरूरतें उत्पन्न की गई हैं।

प्रकृति का हर कण एक स्थिर अवस्था की तलाश में रहता है। एक अणु दूसरे अणु से मिलकर स्थिर होना चाहता है, मनुष्य अपने जैसे स्वभाव वालों के बीच स्थिरता की तलाश करता है, जंगल के जानवर अपनी प्रजाति के साथ रहकर अपने जीवन की आयु को बढ़ाते हैं, क्योंकि उनको उसमें सुरक्षा और स्थिरता का भाव नज़र आता है। लेकिन इस स्थिरता की तलाश में हम स्वयं और प्रकृति से कितने दूर होते जा रहे हैं, यह बहुत ही सोचनीय प्रश्न है।

हम आज जिस समाज में रहते हैं, वह दरअसल एक साथ कई समाजों का समायोजन है। महानगरों में सोसाइटी में रहने वाले अक्सर एक साथ कई समाजों का जीवन जीते हैं। इसकी अच्छी बात यह है कि नई चीज़ों से उनका संपर्क स्थापित होता है और राष्ट्रीय एकता को भी सम्बल प्राप्त होता है। परन्तु इसके कुछ और भी पहलू हैं।

सोसाइटी में हर वर्ग के लोग एक साथ रहते हैं, लेकिन कोई किसी पिछड़े प्रांत से है तो कोई महानगर जैसे विकसित जगहों से, जो ज़िंदगी महानगर वाले रोज़ जीते हैं, वह ज़िंदगी पिछड़े प्रान्त से आने वालों के लिए अप्राप्य लगती है। उनके बच्चे भी उच्च वर्गीय बच्चों की तरह जीने की कोशिश करने लगते हैं।

बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी अपने दिनचर्या को उच्च वर्गीय दिनचर्या में ढालने की कोशिश करने लगते हैं। स्वस्थ रहने के लिए अगर दौड़ने से कम आमदनी वालों का काम चल जाता था तो अब जिम ,उसके लिए जूते, कपड़े और पता नहीं कितनी ही अनावश्य आवश्कताएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

खान-पान ,कपड़े, मनोरंजन और हर चीज़ में एक होड़ लग जाती है। दिन-रात सिर्फ एक ही मकसद हो जाता है कि पड़ोसियों से आगे निकल जाएं या उन्हें पीछे होने का अहसास दिलाएं, भले ही यह अहसास आत्म-मुग्धता के लिए ही क्यों ना हो। इस रेस में मनुष्य कब अपनी नैसर्गिकता से दूर हो जाता है, उसे खुद भी पता नहीं चलता।

अप्राकृतिक समाज में फिट होने के लिए कितनी ही अपारम्परिक ढांचों का शिकार हो जाता है। एक प्राकृतिक मनुष्य जिस मनुष्य को किताबें पढ़ने और गाने सुनने में आनंद आता था, वह महंगे मॉल्स और ट्रेवलिंग में वह आनंद ढूंढने लगता है और दिनों -दिन अवसाद का शिकार होता जाता है…

… जहां उसे एक कपड़े से काम चल जाता था, अब वह दस कपड़ों में भी नाखुश नज़र आता है, क्योंकि उसकी अपेक्षाएं निर्मित हैं और वो दिन -ब- दिन बढ़ती ही जाती हैं। घर से बचत ख़त्म हो जाती है, लड़ाइयां शुरू हो जाती हैं, बच्चे घरेलू हिंसा का शिकार हो जाते हैं और एक स्वस्थ मनुष्य कितनी ही बीमारियों से घिर जाता है।

”मनुष्यवती भूमिरर्थ: “-कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र के प्रथम खंड में अंकित इस शब्द युग्म का अर्थ है -मनुष्य के द्वारा उपयोग में लायी गयी भूमि को ‘अर्थ’ कहते हैं। मनुष्य को अर्थ को संरक्षित रखने की हर चेष्टा करनी चाहिए। इस संसार में बचत का दूसरा कोई पर्याय नहीं है। अगर आप अपनी अपेक्षाओं पर काबू पा सकते है तो आप एक जिम्मेरदार पति, भाई, बेटा और एक जिम्मेदार सामजिक मनुष्य भी बन सकते हैं।

अपनी अपेक्षाओं का, जो जायज़ हों, आदर जरूर करें लेकिन जायज़ और नाजायज़ अपेक्षाओं में अंतर करना जरूर सीखें। बात करने के लिए मोबाइल एक जायज़ आवश्यकता है लेकिन इसके लिए परिवार में बच्चों को भी मोबाइल दे देना न केवल नाजायज़ ही नहीं है बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से भी खराब है।

बच्चों की नाजायज़ मांग पर उनको मोबाइल देकर हम उन्हें सामाजिक होने से रोकते हैं और व्यक्तिगत तौर पर उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर और पंगु बनाते है। हमारी अपेक्षाएं हमें कितनी ही तरहों से आहत करती हैं, लेकिन इससे बचने का उपाय भी हमारे हाथ में ही है।

 लेखक के निजी विचार हैं

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