शिक्षा को न बनाए सामान्य जानकारी देने की रिमोट कंट्रोल्ड मशीन

शिक्षा (Education) शब्द की व्युत्पत्ति लेटिन शब्द "एडुकेयर " से हुई है जिसका अर्थ है "पढ़ाना -लिखाना ","आगे बढ़ाना " और " विकसित करना। "

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Education

सलिल सरोज

कार्यकारी अधिकारी, लोक सभा सचिवालय ।।

शिक्षा (Education) शब्द की व्युत्पत्ति लेटिन शब्द “एडुकेयर ” से हुई है जिसका अर्थ है “पढ़ाना -लिखाना “,”आगे बढ़ाना ” और ” विकसित करना। ” शिक्षा का संधि विच्छेद है- शि = नेतृत्व करना / प्रवेश करना और क्ष = क्रिया/कार्य ,मतलब शिक्षा = योग्य बनाने वाला। इसलिए सरल भाषा में शिक्षा का आशय है पढ़ाने -लिखाने की प्रक्रिया और मनुष्यों को परिपक्व और व्यस्क सदस्यों के रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया।

शिक्षाविद् जे कृष्णमूर्ति कहते हैं- शिक्षा का अर्थ क्या यह नहीं है कि इन सभी समस्याओं का सामना करने के लिए वह आपको समर्थ बनाएं। यह आवश्यक है कि इन सभी समस्याओं का ठीक ढंग से सामना करने के लिए आपको शिक्षित किया जाए। यही शिक्षा है न कि मात्र कुछ परीक्षाएं पास कर लेना कुछ बेहूदा विषयों का-जिनमें आपकी रुचि बिलकुल नहीं है, उसका अध्ययन कर लेना।

सम्यक शिक्षा वही है जो विद्यार्थी की इस जीवन का सामना करने में मदद करे, ताकि वह जीवन को समझ सके, उससे हार न मान ले उसके बोझ से दब न जाए, जैसा कि हममें से अधिकांश लोगों के साथ होता है। लोग, विचार, देश, जलवायु, भोजन, लोकमत, यह सभी कुछ लगातार आपको उस खास दिशा में ढकेल रहे हैं, जिसमें कि समाज आपको देखना चाहता है।

आपकी शिक्षा ऐसी हो कि वह आपको इस दबाव को समझने के योग्य बनाएं इसे उचित ठहराने की बजाए आप इसे समझें और इससे बाहर निकलें जिससे कि एक व्यक्ति होने के नाते, एक मनुष्य होने के नाते, आप आगे बढ़कर कुछ नया करने में सक्षम हो सकें और केवल परंपरागत ढंग से ही विचार करते न रह जाएं। यही वास्तविक शिक्षा है।

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं ऐसी शिक्षा का क्या महत्व है, जो हम भारतीय को सदैव परतंत्रता का मार्ग दिखाती है, जो हमारे गौरव, स्वावलंबन एवं आत्म-विश्वास का क्षरण करती है। वो संस्कृति और सभ्यता के विषय में बात करते हुए कहते हैं कि अगर हर घर में भी स्कूल खोल दें, लेकिन उससे वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा न मिले और अंधविश्वास बढ़े तो ऐसी शिक्षा परतंत्रता के समान है।

स्वर्गीय गोपाल कृष्ण गोखले ने 18 मार्च 1910 में भारत में ‘मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा’ के प्रावधान के लिए ब्रिटिश विधान परिषद् के समक्ष प्रस्ताव रखा था, मगर वह पारित होकर कानून नहीं बन सका। स्वतन्त्र भारत के संविधान में अनुच्छेद 21 द्वारा जीवन तथा वैयक्तिक स्वतन्त्रता के संरक्षण का प्रावधान किया गया है।

शिक्षा व्यवस्था उसी का परिणाम है। अनुच्छेद 28 राजकीय शिक्षा संस्थानों में धर्म की शिक्षा को निषेध करने के साथ सहायता व मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थानों में दी जारही धार्मिक शिक्षा में अनुपस्थित रहने की स्वतन्त्रता विद्यार्थी को देता है। अनुच्छेद 29 भारत के सभी नागरिकों को भाषा, लिपि व संस्कृति को संरक्षित करने के साथ ही धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के किसी भेदभाव के बिना किसी शिक्षा संस्थान में भर्ती होने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 30 भाषा या धर्म के आधार पर अल्प संख्यकों को अपने शिक्षा संस्थान खोलने व उनका प्रबन्ध करने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 41 में राज्य को उसकी आर्थिक सामर्थ्य व विकास की सीमाओं के भीतर रहते हुए शिक्षा पाने में नागरिकों को सहायता देने को कहता है। अनुच्छेद 45 में संविधान लागू होने के 10 वर्ष के भीतर 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करने का निर्देश शासन को दिया था। अनुच्छेद 46 शासन को निर्देश लेता है कि वह अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों तथा पिछड़े वर्ग की शिक्षा हेतु विशेष व्यवस्था करे।

अनुच्छेद 337 अग्लो-इंडियन समुदाय की शिक्षा के लिए विशेष अनुदान देने को कहता है। अनुच्छेद 350 अ प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त करने की सुविधा उपलब्ध को कहता है। अनुच्छेद 351 हिन्दी के विकास की बात करता है।

शिक्षा समवर्ती सूची में होने के कारण केन्द्र व राज्य दोनों का ही विषय है। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार तकनीकी एवं चिकित्सा शिक्षा सहित सम्पूर्ण शिक्षा, राष्ट्रीय महत्व के कुछ विशिष्ट शिक्षा संस्थानों को छोड़ कर, राज्य का विषय है।

संविधान लागू होने के बाद उसके अनुच्छेदों को स्पष्ट करने या संविधान की मूल भावना के अनुरूप उन्हें और प्रभावी बनाने के लिए उनमें समय समय पर परिवर्तन किए गए। शिक्षा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन 1976 में (जब देश में आपातकाल लागू था) किया गया। 40 वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला गया ताकि केन्द्र सरकार कानून बना कर सम्पूर्ण देश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सके। 1986 की नीति में शिक्षा को सम्वर्ती सूची में डालने को एक दूरगामी कदम बताया गया और आशा प्रकट की गई कि इससे केन्द्र व राज्यों के बीच शिक्षा क्षेत्र में अच्छी भागीदारी की शुरुआत होगी।

उच्च व उच्चतम न्यायालयों के फैसलों का प्रभाव भी देश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करते रहे हैं। 1993 में उन्नीकृष्णन के वाद में उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया कि 14 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा पाना बच्चे का मौलिक अधिकार है। 2002 में एनडीए सरकार ने 86वां संशोधन कर संविधान में अनुच्छेद 21 क जोड़ा। अनुच्छेद 21 क से देश में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों हेतु अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करने में शासन की जिम्मेदारी स्पष्ट हो गई।

महात्मा गाँधी ने शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा ‘‘शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक तथा मनुष्य में निहितशारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक श्रेष्ठतम शक्तियों का अधिकतम विकास है।’’ गाँधी जी भारतीय जीवन को सुखी-सम्पन्न बनाना चाहते थे। वे व्यक्ति, समाज और देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक दासता काविरोध कर स्वतंत्रता एवं स्वावलम्बन के आकांक्षी थे। अत: शिक्षा को वे सार्वभौमिक रूप मे प्रसारित करना चाहते थे। उनका मंतव्य था कि साक्षरता न तो शिक्षा का अन्त है न प्रारम्भ। यह मात्र एक साधन है, जिसके द्वारा स्त्री एवं पुरूष को शिक्षित किया जा सकता है।

इंदिरा गाँधी शिक्षा के बारे में कहती थी कि शिक्षा मानव को मजबूत बनाए, जिससे उसे उसके अधिकारों को प्राप्त करने में आसानी हो। इसका आशय यह हुआ की शिक्षा का एक उद्देश्य यह भी है कि किसी भी लाचार और गरीब व्यक्ति को सशक्त बनाना। अगर शिक्षा मनुष्य को सशक्त नहीं बना सकती तो उस शिक्षा नीति की सिरे से नकार देना चाहिए।

जवाहर लाल नेहरू ने एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शिक्षा के महत्त्व को समझाते हुए विज्ञान और प्रौद्यिगिकी को बढ़ावा दिया, जिसके कारण आज देश में आई आई टी , आई आई एम ,इसरो ,मंडी हाउस, नई दिल्ली पर स्थित कला -साहित्य के अनगिनत संस्थान मौजूद हैं। शिक्षा को हर मायने में लोक तांत्रिक होना चाहिए। शिक्षा अमीर और गरीब में किसी तरह का फर्क ना करें। शिक्षा पर हर एक का अधिकार होना चाहिए और शिक्षा से उत्पन्न हर उपहार का लाभ देश के सबसे मजलूम को भी अवश्य मिलना चाहिए। स्कूल,कॉलेज ,विश्वविद्यालयों का प्रमुख कार्य है बौद्धिक वाद-विवादों में संलिप्त होना।

महामना मदन मोहन मालवीय का मानना था कि शिक्षा व धर्म एक दूसरे से अलग नहीं है। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण करना है। धर्म के बिना चरित्र निर्माण नहीं हो सकता। इसी कारण शिक्षा में संस्कृत व गीता को बहुत महत्व दिया।

जे एस राजपूत,एनसीईआरटी के पूर्व अध्यक्ष कहते हैं जिस शिक्षा से बच्चों के कंधे भारी बैग का शिकार न हों और गुणवत्ता को हाशिए पर न रखना पड़ जाए, भारत को वैसी शिक्षा नीति का दामन पकड़ कर रखना चाहिए। इससे इतर भी विश्व में शिक्षा को अपनी हठधर्मिता को साबित करने का कारगार औजार भी बनाया गया है। हिटलर ने अतिराष्ट्रवाद के चक्कर में अन्य धर्म असहिष्णु होकर ऐसी शिक्षा-नीति चलाई कि हर दूसरा आदमी शक की निगाह से देखा जाने लगा। उसकी शिक्षा नीति विभाजन कारी थी,इसी वजह से आज भी हिटलर को शिक्षा के खिलाफ एक क्रूरतम हथियार के रूप में जाना जाता है।

प्लेटो की तरह एरस्टोटल का मानना है कि शिक्षा का नियंत्रण राज्य के हाथों में ही रहना चाहिए। इससे राज्य ऐसी शिक्षा को लागू करने के योग्य बन पाएंगे जो वांछित किस्म के नागरिक बनाने में एक साधन होगी। एरस्टोटल ने यह महसूस किया है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य नैतिक मूल्यों और सदाचार का संवर्धन करना है। जबकि कार्ल मार्क्स शिक्षा और शैक्षणिक संस्थाओं को सरकार के अधीन रूप से वो साधन मानते थे जिससे एक छोटा संप्रभु वर्ग,बड़े से असहाय वर्ग पर साम्राज्य स्थापित कर सके। लेकिन मार्क्स ने शिक्षा में लोकोक्ति, कहानी, किंवदंती,नाटक,संगीत को जोड़ कर नहीं देखा जो किसी भी सरकार को शिक्षा नीति पर हावी होकर सिर्फ किसी एक विचार धारा को आगे बढ़ाने से रोकती है।

मार्क्स दूरगामी तथ्यों की नब्ज़ टटोलते हुए शिक्षा के व्यवसायीकरण के बारे में भी बोलते हैं। अगर शिक्षा को बाज़ारू वस्तु की तरह बेचकर फायदा कमाने की तरफ समाज या राष्ट्र बढ़ेगा तो यह शिक्षा की सबसे बड़ी हार होगी। शिक्षा किसी की बपौती नहीं बल्कि सबका अधिकार होना चाहिए और यह सबको मिलना भी चाहिए। आज के समय में शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण हो गया है। शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण देश के समक्ष बड़ी चुनौती हैं। पुराने समय में भारत में शिक्षा कभी व्यवसाय या धंधा नहीं थी। इससे छात्रों को बडी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षक ही भारत देश को शिक्षा के व्यवसायीकरण और बाजारीकरण से स्वतंत्र कर सकते हैं।

देश के शिक्षक ही पथ प्रदर्शक बनकर भारत में शिक्षा जगत को नई बुलंदियों पर ले जा सकते हैं। हरमन हेस के उपन्यास “सिद्धार्थ” पर आधारित इसी नाम से कॉनराड रूक्स द्वारा निर्देशित फिल्म में शशि कपूर अस्तित्व की तलाश में भटकते हुए दिखाए गए हैं और इस तलाश की प्राप्ति यह थी कि किसी मनुष्य का अस्तित्व सार्थक इसलिए है क्योंकि वह सोच सकता है, और सोचने की क्षमता मनुष्य में समाज,संस्कृति और सभ्यता से मिलती है और इस सब के तार मूल रूप से शिक्षा से जुड़े हुए हैं।

शिक्षा आपको निर्वाध करती है जैसे कि सिद्धार्थ को बुद्ध बनकर मोक्ष की प्राप्ति हुई ,महावीर,जैनेन्द्र बनकर महापरिनिर्वाण की प्राप्ति कर पाए और अपने ज्ञान से महाराज युधिष्ठिर ,यक्ष के सारे प्रश्नों के उत्तर देकर अपने भाइओं के प्राण बचा पाए।

शिक्षा आपको सोचने और प्रश्न करने के लायक बनाती है। अगर शिक्षाविद,कलाकार,जिज्ञासुजन प्रश्न करना छोड़ दें तो समाज रूग्णता की ओर अग्रसित हो जाता है। इस देश का इतिहास रहा है गार्गी,विद्योत्तमा और रत्नावली जैसी विदुषियों ने हमेशा से ही वाद-विवाद और व्याख्यान को शिक्षा का एक अभिन्न अंग बना कर रखा है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्विद्यालयों में साक्षताकार पर ही प्रवेश मिलता था जो इस बात की परिचायक है कि प्रश्न पूछना और उसके सही उत्तर प्राप्त होने तक एक चकवा की तरह सावन के लिए प्यासा रहना शिक्षा की सबसे बेहतरीन पद्धति है।

प्रश्न हर चीज़ पर और हर एक से करिए क्योंकि प्रश्न पूछने वाला एक बार को हँसी का पात्र बन सकता है और जो प्रश्न नहीं पूछता वह ज़िंदगी भर हँसी का पात्र बनने को बाध्य होता है। प्रश्न पूछने से आपके ज्ञान में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और आप में आत्म विश्वास का संचार होता है। आप हर उस चीज़ पर प्रश्न करें जो आपको परेशान करती है और आपको एक बेहतर मनुष्य होने से रोकती है। बेहतर मनुष्य होने और एक जिम्मेदार नागरिक होने की प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्रसंघ के चार्टर में भी अंकित है।

लेकिन क्या सही मायनों में शिक्षा का विकास हो पाया है? उन्नीकृष्णन के प्रसंग में उच्चतम न्यायालय के निर्णय में 0 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा की बात थी मगर शिक्षा के अधिकार कानून में 6 से 14 वर्ष के बच्चों को ही सम्मिलित किया गया है। 0 से 6 वर्ष के बच्चों को छोड़ दिया गया है। इसी तरह पड़ौस के विद्यालय की उस अवधारणा को छोड़ दिया गया है जो कोठारी आयोग ने दी थी। 1986 की शिक्षा नीति में इसे लागू करने की बात कही गई है।

शिक्षा कानून का बनाना व उसे ईमानदारी से लागू करना दो अलग अलग बातें हैं। शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप व्यवस्थाओं को करने हेतु जितना धन चाहिए उतना धन उपलब्ध नहीं कराया गया है। केन्द्र राज्यों से उम्मीदकर रहा है और राज्य केन्द्र से, शिक्षा दोनों के बीच निसहाय पड़ी है। कानून सभी के लिए शिक्षा के समान अवसर की बात तो करता है मगर पंचतारा सुविधा से लेकर छतहीन विद्यालयों तक के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है। ऐसे में समानता कैसे आएगी?

शिक्षा के अधिकार कानून में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने की बात स्वीकार की गई है मगर देश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यलयों की बाढ़ आरही है। मातृभाषा के विद्यालय अपने अस्थित्व को बचाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। हम विश्व शक्ति बनने का स्वप्न देख रहे हैं।

स्वप्न देखना कोई बुरी बात नहीं मगर बिना आधार के स्वप्न देखना मंहगा भी पड़ सकता है। उचित शिक्षा के अभाव में छोटी सी अफवाह हिंसक दंगों में बदलने की घटनाएं हो रही है। अन्धविश्वास के कारण बच्चों की बली दी जा रही है तो औरतों को डायन बता कर मारा जारहा है। सही शिक्षा ही देश को इन जड़ताओं से उबार सकती है। शिक्षा को खर्च को निवेश मानने तथा साहस व विवेक दिखाने की आवश्यकता है।

शिक्षा को मूलभूत रूप से अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने का काम करना चाहिए। इसको इस तरह भी समझा जा सकता है। तार्किक डर का मतलब है कि अगर हम गलत काम करेंगे तो हमें सज़ा भुगतनी पड़ेगी और अतार्किक डर का मतलब उधर अँधेरे में मत जाओ,भूत पकड़ लेगा। इस अतार्किकता से तार्किकता की ओर ले जाने वाली सबसे सक्षम नीति है -शिक्षा,जो आपको स्वछंद विचरण करने आज़ादी दे और हर घडी स्वयं से बेहतर मनुष्य बनने की चुनौती प्रस्तुत करती रहे।

शिक्षा को केवल सामान्य जानकारी देने का रिमोट कंट्रोल्ड मशीन नहीं होना चाहिए बल्कि शिक्षा को सबल बनाने का हथियार होना चाहिए हर नागरिक को उसके अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और उसे कैसे प्राप्त करना है,इसकी जानकारी हर गली,मोहल्ले,स्कूल के दीवारों हर जगह पर इश्तहार के रूप में मौजूद होना चाहिए।

शिक्षा वैसी लीजिए ,जिससे आप दूसरों को भी कुछ दे सकें ,ना कि दूसरों से माँगते फिरें।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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