कोरोना महामारी की सम्पूर्ण स्थितियों का ज्योतिषीय अनुमान…

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कोरोना महामारी की सम्पूर्ण स्थितियों का ज्योतिषीय अनुमान...

डॉ. फणीन्द्र कुमार चौधरी

एसोसिएट प्रोफेसर, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ।।  

सृष्टि के आरंभ से इस काल चक्र में कई युग एवं महायुगों का आरंभ और अंत हुआ है। कोरोना महामारी की सम्पूर्ण स्थितियों का ज्योतिषीय अनुमानसृष्टि के आरंभ से इस काल चक्र में कई युग एवं महायुगों का आरंभ और अंत हुआ है। पुराणों में प्रलय, महाप्रलय के रूप में इसका वर्णन होता है। प्रलय के चार भेद हैं। नित्य प्रलय,आत्यन्तिक प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृत प्रलय। सम्प्रति कलियुग में 5120 वर्ष व्यतीत हुए हैं, जबकि कलियुग का मान 4 लाख 32 हजार वर्ष का है। अत: इस महामारी से घटने वाली घटना नित्य प्रलय के अंतर्गत आती है।

प्रतिदिन जन्म एवं मृत्यु से संबंधी विषय नित्य प्रलय कहलाता है। ज्योतिष शास्त्र फल का नियामक नहीं है बल्कि सूचक है। मानव के कई जन्म-जन्मांतरों का कर्म फल प्रारब्ध बनकर भोगना होता है। अत: जब मानव का कर्म स्वार्थवश दूषित होने लगता है, तब लगभग 100 वर्ष के समीप इस प्रकार की महामारी, युद्ध, दुर्भिक्ष बनकर मानव को चेतावनी देने लगता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अंतिम सत्ता ईश्वराधीन है। अत: मानव को अहंकार रहित होकर कर्म करना चाहिए।

इस संदर्भ में ज्योतिष के अनुसार ग्रह नक्षत्रों की स्थिति क्या होती है, इस विषय में ज्योतिष शास्त्र में विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें प्रमुख कारण 1-ग्रहण, 2-ग्रहों की राशि का परिवर्तन, 3-ग्रहों की गति, 4-ग्रहों का एक राशिगत होना, यह ग्रहयुद्ध भी कहलाता है। 5-ग्रहों में परस्पर संबंध 6- ग्रहों की दृष्टि आदि है।

(क)- इस महामारी का बीजारोपण 16-17 जुलाई 2019ईं. को हो गया था जब कर्क राशि में सूर्य संक्रांति चंद्र नक्षत्र उत्तराषाढ़ा के अंतर्गत हुआ। संक्रांति एवं चंद्रग्रहण एक ही दिन दो मिनट के अंतराल में हुआ है। 17 जुलाई 2019 ई. को रात्रि एक बजकर 30 मिनट से चंद्रगहण प्रारंभ हुआ और रात्रि चार बजकर 31 मिनट भारतीय स्टैंडर्ड समय में मोक्षकाल था अर्थात समाप्त हुआ। जबकि सूर्य उत्तराषाढ़ा चंद्र नक्षत्र में रात्रि चार बजकर 33 मिनट पर कर्क राशि में संक्रमण (संक्रांति) करता है। चंद्रग्रहण एवं सूर्य की संक्रांति एक ही चंद्र नक्षत्र में  होना तथा ग्रहों की परस्पर स्थिति जैसे-समसप्तक, द्विर्द्वादश, षडष्टक, ज्योतिष गणना के अनुसार दोष युक्त कहलाता है, यह संपूर्ण विश्व के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। जिसका विवरण 2019-20 ई. के विद्यापीठ पंचांग में दिया गया है। यह ग्रहण फल का लेख दैनिक जागरण में छापा भी गया है।

(ख)- दूसरी घटना यह है कि 26 दिसंबर 2019 ई. को कंकण सूर्यग्रहण लगा था और छह ग्रह एक साथ अग्नि तत्व राशि धनु में स्थित थे। ज्योतिष विषयानुसार कई ग्रहों से ग्रहण योग संबंधी दोष उत्पन्न हो रहा था। केवल शनि का अंश थोड़ा अधिक है।

(1) मंगल ग्रह 25 दिसंबर 2019 ई. को वृश्चिक राशि में प्रवेश किया था, जो ग्रहण के दिन छह ग्रहों से द्विर्द्वादश संबंध स्थापित कर रहा था जो ज्योतिष शास्त्र के अनुरूप अनिष्टकारक योग बनाता है।

(2) एक ग्रहण का अशुभ फल दूसरे ग्रहण आने तक जगत को प्रभावित करता रहता है। परंतु दूसरा सूर्यग्रहण (26 दिसंबर 2019 ई.) कई ग्रहों के एक साथ होने के कारण उन ग्रहों से संबंधित ग्रहण दोष भी उत्पन्न करता है। जो विश्व के समक्ष आर्थिक, शारीरिक महामारी एवं राजनीतिक परिस्थितियों को एकाएक नीचे ले जाने में यह काल अपने आप में समर्थ हो गया।

अब प्रश्न उठता है कि इस महामारी के दुष्परिणाम कब तक चलेंगे? मित्रो बताना चाहूंगा कि यह स्थिति 14 अप्रैल 2020 ई. से सूर्य अपनी उच्च राशि में होंगे तो अपने ताप से विषाक्त कीटाणुओं (वायरस) को नष्ट करने में सक्षम होंगे।

(3) ज्योतिषीय सबसे बड़ा कारण शनि-मंगल के साथ गुरु का नीच का होना, यह प्रतिकूल परिस्थितियों को उत्पन्न करता है। यह स्थित 22 मार्च एवं 30 मार्च 2020 ई. से है।

(4) गुरु ग्रह मकर राशिगत 14 मई को वक्री होकर 30 जून 2020 ई. को धनु राशि में प्रवेश करेंगे। 14 मई से सूर्य भी अपनी राशि परिवर्तन करेंगे। अत: इससे यह प्रतीत होता है कि 15 मई 2020 ई. से वातावरण में काफी अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। 21 जून को सूर्यग्रहण लग रहा है तथा 30 जून को बृहस्पति अपनी राशि में वापस लौट रहे हैं। यह दोनों योग भी स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि पुराने ग्रहण का दुष्परिणाम हटाने (नष्ट करने) में सहयोग करेगा अर्थात हालात में काफी सुधार होने की संभावना है।

(5) 18 जून को मीन राशि में मंगल का जाना एक अच्छा संकेत है। जो शनि से एक राशि अंतराल (फासला) होने के कारण यानी दोनों के बीच में दूरी बनना यह शुभ सूचक योग है।

(6) सबसे बड़ी बात यह है कि शनि के साथ-साथ गुरु, मंगल आदि ग्रहों का राहु ग्रह से षडष्टक दोष युक्त जब तक रहेगा, तब तक विश्व में आर्थिक मंदी, रोग, युद्ध की आशंका एवं भय विश्व में व्याप्त रहेगा।

राहु का राशि परिवर्तन 23 सितंबर 2020 ई. को हो रहा है, अत: तब तक शारीरिक पीड़ा का भय लोगों में व्याप्त रहेगा। अब सामाजिक एवं शारीरिक दृष्टिकोण से ग्रहों का गुण धर्म इस प्रकार है- सभी ग्रहों का प्रभाव मानव जीवन पर निश्चित रूप से पड़ता है। परंतु यहां पर मंगल, गुरु एवं शनि के गुण धर्म पर विशेष प्रकाश डाल रहा हूं।

बृहस्पति ग्रह का सामाजिक या (अनात्मिक) दृष्टिकोण से गुण धर्म- व्यापार, कार्य, वे स्थान और व्यक्ति जिनका संबंध धर्म और कानून से है, जैसे-मंदिर, पुजारी, मंत्री, न्यायालय, न्यायाधीश, शिक्षा संस्थाएं, विश्वविद्यालय, सभाएं, जनता के उत्सव, दान, सहानुभूति आदि का प्रतिनिधित्व करता है।

शारीरिक दृष्टिकोण से- पैर, जंघा, जिगर, पाचन क्रिया, रक्त एवं नसों का प्रतिनिधित्व करता है।

मंगल का सामाजिक दृष्टिकोण से गुण धर्म-सैनिक, डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, रसायनिक, नाई, बढ़ई, लुहार, मशीन का कार्य करने वाला, मकान बनाने वाला, खेल एवं खेल के सामान आदि का प्रतिनिधित्व करता है।

मंगल का शारीरिक दृष्टिकोण से गुण धर्म- यह बाहरी सिर, खोपड़ी, नाक एवं गला का प्रतीक है। इसके द्वारा संक्रामक रोग, घाव, खरोंच, ऑपरेशन, रक्तदोष, दर्द आदि अभिव्यक्त होता है।

शनिग्रह का सामाजिक दृष्टिकोण से गुण धर्म- कृषक, हलवाहक, पत्रवाहक, चरवाहा, कुम्हार, माली, मठाधीश, कृपण, पुलिस अफसर, उपवास करने वाले साधु-संन्यासी आदि व्यक्ति तथा पहाड़ी स्थान, चट्टानी प्रदेश, बंजर भूमि, श्मशानघाट, कब्रिस्तान, चौरस मैदान आदि का प्रतिनिधि है।

शारीरिक दृष्टिकोण से शनिग्रह का गुण धर्म- यह शरीर में हड्डियां, नीचे की आंतें एवं मांसपेशियों पर प्रभाव डालता है। उपरोक्त सामाजिक एवं शारीरिक ग्रहों के गुणधर्म शास्त्र सम्मत हैं।

निष्कर्ष

जब कभी भी शनि तथा राहु ग्रह से जिन ग्रहों का षडाष्टक योग अथवा शनि एवं राहु से सामीप्य योग बनने पर उन ग्रहों के गुण धर्म संबंधी विचारणीय विषयों में अवरोध उत्पन्न करता है। क्योंकि शनि का दूसरा नाम मन्द है। धैर्य का परिचय लेता है। यहां शनि से सामीप्य योग मंगल का 25 दिसंबर 2019 ई. को हो गया था एवं 18 जून 2020 ई. तक रहेगा। अत: यह मध्यवर्ती काल मंगल जन्य शारीरिक तथा सामाजिक गुण धर्म से संबंधित, जैसे- मंगल गला, नाक एवं संक्रामक रोग को उत्पन्न करने वाला ग्रह है। शनि वायु तत्व कारक ग्रह होने से फैलता है। अत: यह उपरोक्त समयावधि विश्व के लिए अत्यंत कष्टकारक है।

जब शनि से बृहस्पति 30 जून 2020 ई. को अलग होंगे तो बृहस्पति संबंधी विचारणीय गुणधर्म उतार-चढ़ाव के साथ प्रारंभ हो जाएंगे। जैसे- स्कूल, कॉलेज, व्यापार आदि। व्यापार, बाजार तथा जीडीपी के दृष्टिकोण से छह अप्रैल 2021 ई. के उपरांत उत्तम फल सूचक रहेगा। भारत अन्य देशों की अपेक्षा अधिक उन्नतशील रहेगा।

संक्रामक जन्य रोग 15 अप्रैल से स्थिर स्थिति में अवरोही उन्मुख होगा। 15 मई से 70 प्रतिशत महामारी कंट्रोल रहेगी। 18 जून के बाद इस महामारी के ऊपर विजय की तरफ 50 प्रतिशत कार्य संपन्न हो जाएगा। अर्थात आरोही से अवरोही क्रम में यह रोग भागते हुए दिखाई देगा। 23 सितंबर 2020 ई. के बाद संपूर्ण विश्व में इस रोग की रोकथाम हो जाएगी। व्यापार की दृष्टि से 2020 ई. सामान्य से नीचे रहेगा। 2021 ई. के उपरांत संपूर्ण विश्व के लिए अति उत्तम रहेगा। थोड़ा बहुत ग्रहों के आपसी संबंध में उतार-चढ़ाव होने से थोड़ा बहुत स्थान विशेष पर प्राकृतिक प्रकोप होते रहेंगे। परंतु इस प्रकार की भयावह स्थिति नहीं होगी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

 डॉ. फणीन्द्र कुमार चौधरी

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