26 साल बीत जाने के बाद भी ताजा है जख्म, बाबरी विध्वंस के 26वीं बरसी आज

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बाबरी विध्वंस की तस्वीर

दो दशक से भी ज्यादा समय बीत चुका है. लेकिन कुछ बातें जेहन में ऐसे बैठ जाती हैं जो हमेशा याद रहती हैं. 6 दिसंबर 1992 का दिन की वो लड़ाई जो आज तक लड़ी जा रही है. चलिए जानते है पूरी कहानी की क्या है बाबरी विध्वंस

1984 में राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन शुरू किया गया. इसी अभियान के चलते फ़रवरी 1986 में जब केंद्र में कांग्रेस की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी, अदालत ने विवादित परिसर का ताला खुलवा दिया. प्रतिक्रिया में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ. इस बीच मामला ज़िला अदालत से उठकर लखनऊ हाई कोर्ट पहुंच गया. फिर सुलह समझौते की उम्मीद में 1989 लोकसभा चुनाव से पहले राजीव गांधी ने मस्जिद से क़रीब 200 फ़ीट दूर यानी लगभग मानस भवन के नीचे नए राम मंदिर का शिलान्यास करवा दिया. राजीव गांधी चुनाव हार गए. वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार में भी सुलह समझौते की कोशिश बेकार गई.

आडवाणी ने तूफान खड़ा कर दिया

बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से राम रथयात्रा निकालकर राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया. 1991 में कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में वापस आ गई और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने. लेकिन राम मंदिर आंदोलन के चलते उत्तर प्रदेश में पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी. कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर मस्जिद की सुरक्षा का वादा किया जिसके चलते अदालत ने विश्व हिंदू परिषद को सांकेतिक कार सेवा की अनुमति दी थी… लेकिन वीएचपी और बीजेपी नेताओं ने देश भर में घूम-घूम कर कारसेवकों को मस्जिद का नामोनिशान मिटाने की क़समें खिलाई थीं.

इनका हौसला बढ़ाने के लिए कल्याण सिंह ने घोषणा कर रखी थी कि पुलिस कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएगी. इससे पहले 1990 में मुलायम सरकार ने कार सेवकों पर गोली चलवा कर मस्जिद को टूटने से बचा लिया था. कल्याण सिंह ने विवादित परिसर के बग़ल में स्थित प्रस्तावित राम कथा पार्क की 42 एकड़ ज़मीन विश्व हिंदू परिषद को दे दी थी. देश भर से आए कारसेवकों को ठहराने के लिए विवादित परिसर से सटकर तंबू कनात लगाए गए. इन्हें लगाने के लिए फावड़े कुदाल रस्सियां वग़ैरह भी लाई गईं जो बाद में मस्जिद के गुंबदों पर चढ़ने और उन्हें तोड़ने में औज़ार के रूप में काम आए. कुल मिलाकर विवादित परिसर के आसपास कारसेवकों का ही क़ब्ज़ा था. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रेक्षक ज़िला जज तेज शंकर कह रहे थे कि सांकेतिक कारसेवा शांतिपूर्वक कराने के लिए सारी व्यवस्था दुरुस्त है.

 सांकेतिक कारसेवा का फैसला

एक दिन पहले यानी 5 दिसम्बर को दोपहर विश्व हिंदू परिषद मार्ग दर्शक मंडल ने औपचारिक निर्णय लिया कि केवल सांकेतिक कारसेवा होगी…निर्णय के अनुसार कारसेवक सरयू से जल और रेत लेकर आएंगे और मस्जिद से कुछ दूर शिलान्यास स्थल पर समर्पित कर वापस चले जाएंगे. जैसे ही इस निर्णय की घोषणा हुई कारसेवकों में रोष फैल गया. विश्व हिंदू परिषद के सर्वोच्च नेता जब कारसेवकपुरम पहुंचे तो उत्तेजित कारसेवकों ने उन्हें घेर कर काफ़ी बुरा भला कहा. कार सेवकों का कहना था कि नेता लोग कुछ भी कहें हम तो असली कारसेवा करके यानी मस्जिद को ध्वस्त करके ही जाएंगे.

उधर, लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने एक आम सभा में कारसेवकों का ये कहते हुए हौसला बढ़ाया कि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने इजाज़त दी है. वाजपेयी शाम की ट्रेन से दिल्ली चले गए, जबकि आडवाणी और डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी कल्याण सिंह से मंत्रणा करके रात में अयोध्या पहुंच गए. छह दिसम्बर की सुबह जहां अयोध्या में जय श्रीराम के नारे गूंज रहे थे, फ़ैज़ाबाद छावनी इलाक़े में बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्ध सैनिक बल इस तैयारी में थे कि जैसे ही बुलावा आएगा वे अयोध्या कूच कर देंगे. सेना, वायुसेना भी निगरानी पर थी… ये बात दीगर है की राज्य सरकार ने वहां इनकी तैनाती पर एतराज़ जताया था, यानी राज्य सरकार की तरफ़ से साफ़ था कि कारसेवकों पर बल प्रयोग नहीं होगा. राम कथा कुंज में एक जैन सभा रखी गयी थी, जहां सिंघल, आडवाणी, जोशी उमा भारती आदि नेता जमा थे.

यज्ञ स्थल का नज़ारा

मस्जिद और मानस भवन के बीच शिलान्यास स्थल को यज्ञ स्थल जैसा बनाया गया था. जहां महंत राम चंद्र परमहंस और दीगर साधु संन्यासी जमा थे. इसी स्थान पर ग्यारह बजे से सांकेतिक कारसेवा होनी थी. माथे पर केसरिया पट्टी बांधे आरएसएस कार्यकर्ता सुरक्षा के लिए तैनात थे. उनके पीछे रस्सा लगाकर पुलिस थी ताकि यज्ञ स्थल तक विशिष्ट लोग ही जा सकें. सुबह 10:30 बजे के आसपास जोशी और आडवाणी यज्ञ स्थल की तरफ आए. उनके पीछे और बहुत से कारसेवक घुसने लगे. पुलिस ने रोका, पर वो नहीं माने. तब केसरिया पट्टी बांधे वॉलंटियर्स ने उन पर लाठियां भांजनी शुरू की जिस पर पूरे कैंपस में तीखी प्रतिक्रिया हुई. देखते- देखते सैकड़ों कार सेवक मस्जिद की ओर दौड़ने लगे. मस्जिद की सुरक्षा के लिए चारों तरफ़ लोहे का जाल लगा था.

लाचार दिखा सुरक्षाबल

पीछे से एक ग्रुप ने पेड़ पर रस्सा फेंका और उसके सहारे मस्जिद के अंदर घुसने का प्रयास किया. वीआईपी स्थल के पास तैनात पुलिस ने कुछ देर कारसेवकों को मस्जिद की तरफ जाने से रोकने की कोशिश की. लेकिन कुछ ही मिनटों में एक-एक करके कई कारसेवक मस्जिद के गुंबद के ऊपर नज़र आने लगे. इन्हें देखकर ज़ोर-ज़ोर से नारे लगने लगे ‘एक धक्का दो और बाबरी मस्जिद तोड़ दो’. सभास्थल से अशोक सिंघल और कुछ अन्य नेताओं ने कारसेवकों से नीचे उतरने की अपीलें की, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. कुदाल, फावड़ा जिसके पास जो औज़ार था उससे गुंबद तोड़ने लगा.. कुछ लोग चूने सुर्खी की इस इमारत को हाथों से ही तोड़ने लगे.

इस बीच, मस्जिद की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र बल के लोग राइफ़लें कंधे पर लटकाए बाहर आ गए. सारे आला अफ़सर लाचार खड़े थे. इतने में कारसेवकों के एक ग्रुप ने आसपास के सारे टेलीफ़ोन तार तोड़ डाले. कार सेवकों का एक जत्था मानस भवन के ऊपर आया और फ़ोटो लेने से मना करने लगा.

पत्रकार भी बने कारसेवकों का निशाना

अब पत्रकारों पर हमला शुरू हो चुका था. कुछ लोग पत्रकारों की तरफ बढ़े. लोगों का हुजूम देखकर पत्रकार वहां से भागने लगे. इस बीच पत्रकारों पर डंडे और पत्थर फेंके जाने लगे. बाबरी मस्जिद के बिल्कुल सामने मानस धर्मशाला में सभी पत्रकार घुस गए. अंदर भी पत्रकारों को घेरकर मारा-पीटा जा रहा था. कुछ लोगों को थप्पड़, मुक्के,और कुछ डंडे पड़े लेकिन तब तक सीआरपीएफ के कुछ जवानों ने पत्रकारों को अपने घेरे में लेकर सीता रसोई में अंदर कर दिया…. थोड़ी ही दूर पर राम चबूतरा था जिसकी छत पर मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, आचार्य धर्मेंद्र, साध्वी ऋतंभरा समेत कई नेता मौजूद थे। साध्वी ऋतंभरा और वीएचपी नेता लाउडस्पीकर पर नारे लगा रहे थे ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो’।

12 बजे तक विध्वंस ज़ोरों से शुरू हो चुका था

लालकृष्ण आडवाणी को डर था कि फ़ैज़ाबाद से केंद्रीय बल या फ़ौज आ सकती है, इसलिए उन्होंने सभा में मौजूद लोगों से मुख्य राज मार्ग पर ट्रैफ़िक जाम करने की अपील की.

कल्याण सिंह के इस्तीफ़े की पेशकश’

कहते हैं कि कल्याण सिंह तक यह ख़बर पहुंची तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने की पेशकश की, लेकिन आडवाणी ने कहलाया कि अब जब तक मस्जिद गिर न जाए वे इस्तीफ़ा न दें, क्योंकि इस्तीफ़ा देते ही केंद्रीय शासन लग जाता… इस बीच, कुछ साधु संत भगवान राम लक्ष्मण की मूर्तियों को बाहर निकाल लाए. देखते ही देखते पांच बजे तक तीनों गुंबद धराशायी हो गए. इसके बाद ही कल्याण सिंह ने त्यागपत्र सौंपा… शाम तक राष्ट्रपति शासन तो लग गया, लेकिन प्रशासन को ये समझ नहीं आ रहा था कि करना क्या है? पर कार्यवाही के डर से कारसेवक अयोध्या से खिसकने लगे. कुछ लोग निशानी के तौर पर मस्जिद की ईंटें साथ ले गए.

आडवाणी, जोशी और वाजपेयी जैसे बड़े नेताओं ने घटना पर खेद प्रकट किया

पुलिस ने मस्जिद गिराने के लिए लाखों अज्ञात कारसेवकों पर मुक़दमा दर्ज किया. कुछ ही मिनट बाद बीजेपी और विहिप के आठ बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने का एक और नामज़द मुक़दमा क़ायम किया गया. प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव दिन भर तो ख़ामोश थे, पर शाम को अपने प्रसारण में न केवल घटना की भर्त्सना की, बल्कि मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात कही.  केंद्र सरकार के निर्देश पर स्पेशल ट्रेनें और बसें चलाई गईं, जिससे कारसेवक वापस अपने घरों को जा सकें और प्रशासन बिना बल प्रयोग किए विवादित स्थल पर क़ब्ज़ा वापस ले.

उधर, कारसेवकों का एक ग्रुप ध्वस्त हुई मस्जिद के मलबे पर एक अस्थायी मंदिर बनाने में जुट गया. मूर्तियां वापस प्रतिष्ठित कर दी गईं . सात दिसंबर को प्रशासन ने कुछ बचे-कुचे कारसेवकों को खदेड़कर अस्थाई मंदिर पर क़ब्ज़ा कर लिया है. पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के लोग श्रद्धा के साथ रामलला के दर्शन कर आशीर्वाद ले रहे थे. 6 दिसम्बर को अयोध्या में केवल बाबरी मस्जिद नहीं टूटी, बल्कि भारतीय संविधान के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की मर्यादा भी टूटी.

शक्तियों के बंटवारे की संघीय अवधारणा टूटी. क़ानून के शासन की बुनियाद टूटी. लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यानी मीडिया भी कारसेवकों के हमले का शिकार हुआ. साथ ही साथ संघ परिवार के अनुशासन का अभिमान भी टूटा… सब कुछ टूटने के बावजूद पिछले 26 सालों में विवाद जहां का तहां है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी नहीं सूझ रहा कि अयोध्या का सिरा कहां से पकड़ें ?

 

 

 

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